लीवर खींचते ही फंदे पर लटका जिस्म और निकलने लगी जान

दोषी को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद डेथ वारंट जारी किया जाता है. वारंट में फांसी की सजा का समय और तारीख लिखी होती है. कैदी को डेथ सेल में रखा जाता है. डेथ सेल यानी वो जगह जहां सिर्फ उन्हीं कैदियों को रखा जाता है, जिन्हें मौत की सज़ा मिली है. फांसी का फंदा भी किसी आम रस्सी का नहीं बनाया जाता. बल्कि ये एक खास रस्सी होती है. जिसे मनीला रोप कहते हैं. फांसी के फंदे के लिए ये रस्सी देश में सिर्फ बिहार की बक्सर जेल में तैयार होती है. फांसी से एक या दो दिन पहले फांसी दिए जाने वाले शख्स को डेथ सेल से निकाल कर दूसरे सेल में डाल दिया जाता है. जिससे वह कुछ देख ना सके.

फांसी की सुबह करीब चार बजे ही फांसी पर चढ़ने वाले को नहाने और नए कपड़े पहनने को कहा जाता है साथ ही चाय के लिए पूछा जाता है. इसके बाद ब्लैक वारंट पर लिखे वक्त के हिसाब से कैदी को उसके सेल से बाहर निकाला जाता है. उसके इर्द-गिर्द 12 हथियारबंद गार्ड होते हैं. कैदी को सेल से फांसी के तख्ते तक उसका चेहरा ढक कर ले जाया जाता है. ताकि उसके आस-पास क्या चल रहा है वो देख ना सके. फांसी घर में एक डाक्टर जो डेथ सर्टिफिकेट पर दस्तखत करता है. एक सब डिविजनल मजिस्ट्रेट. जिनकी निगरानी में फांसी की पूरी प्रक्रिया होती है. इनके अलावा 10 कांस्टेबल और दो हेड कांस्टेबल मौजूद रहते हैं जो प्रक्रिया के दौरान एक दूसरे से बात नहीं करते.

जेलर ब्लैक वारंट के हिसाब से तय वक्त होते ही रूमाल नीचे की तरफ गिरा कर इशारा करता है. लिवर पकड़े जल्लाद या पुलिसवाला लिवर खींच देता है. लीवर खींचने के आधे घंटे बाद पहली बार डॉक्टर मरने वाले की धड़कनें और नब्ज टटोलता है. अगर ध़ड़कन रुक गई और नब्ज थम गई तब डॉक्टर के इशारे पर फांसी के फंदे से लाश नीचे उतार ली जाती है. पूरी फांसी की कार्रवाई के दौरान जेल के अंदर हर काम रोक दिया जाता है. एक बार जैसे ही फांसी की प्रकिया खत्म होती है तो जेल की ज़िंदगी दोबारा शुरू हो जाती है.

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